श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 87: द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.87.16 
कथं वत्स्यथ दुर्गेषु वने ऋद्धिविनाकृता:।
वीर्यसत्त्वबलोत्साहतेजोभिरकृशा: कृशा:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
ऐसे धन से रहित होकर तुम वन के दुर्गम स्थानों में कैसे रह सकोगे? साहस, धैर्य, बल, उत्साह और तेज से संपन्न होने पर भी तुम दुर्बल हो॥16॥
 
Being deprived of such wealth, how will you be able to live in the remote places of the forest? Despite being blessed with courage, patience, strength, enthusiasm and brilliance, you are still weak.॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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