श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 87: द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.87.12 
तदवस्थान् सुतान् सर्वानुपसृत्यातिवत्सला।
स्वजमानावदच्छोकात् तत्तद् विलपती बहु॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उस समय कुन्ती का हृदय अपने सभी पुत्रों के प्रति अपार स्नेह से भर गया और वह उन्हें गले लगाकर अत्यंत शोकपूर्ण स्वर में बोली॥12॥
 
At that time Kunti's heart was filled with immense affection for all her sons. She embraced them and spoke in a very mournful manner.॥12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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