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श्लोक 2.86.24  |
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा पाण्डव: सत्यविक्रम:।
भीष्मद्रोणौ नमस्कृत्य प्रातिष्ठत युधिष्ठिर:॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! विदुर के ऐसा कहने पर वीर पाण्डु नन्दन युधिष्ठिर भीष्म और द्रोण को प्रणाम करके वहाँ से चले गये। 24॥ |
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| Vaishampayanji says – Janamejaya! On Vidur saying this, the brave Pandu Nandan Yudhishthir left the place after saluting Bhishma and Drona. 24॥ |
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इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि युधिष्ठिरवनप्रस्थानेऽष्टसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें युधिष्ठिरका वनको प्रस्थानविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७८॥
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