श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 86: युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिसे विदा लेना, विदुरका कुन्तीको अपने यहाँ रखनेका प्रस्ताव और पाण्डवोंको धर्मपूर्वक रहनेका उपदेश देना  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  2.86.14-15 
हिमवत्यनुशिष्टोऽसि मेरुसावर्णिना पुरा।
द्वैपायनेन कृष्णेन नगरे वारणावते॥ १४॥
भृगुतुङ्गे च रामेण दृषद्वत्यां च शम्भुना।
अश्रौषीरसितस्यापि महर्षेरञ्जनं प्रति॥ १५॥
 
 
अनुवाद
प्राचीन काल में हिमालय पर मेरुवर्ण ने तुम्हें धर्म और ज्ञान का उपदेश दिया था, वारणावत नगर में श्री कृष्णद्वैपायन व्यासजी ने, भृगुतुंग पर्वत पर परशुरामजी ने तथा दृषद्वती के तट पर साक्षात् भगवान शंकर ने तुम्हें उत्तम उपदेश दिये थे। अंजन पर्वत पर महर्षि असित का उपदेश भी तुमने सुना था। 14-15॥
 
In ancient times, Merusavarna has preached religion and knowledge to you on the Himalayas, Shri Krishnadvaipayana Vyasji in Varanavat city, Parashuramji on Bhrigutung mountain and Lord Shankar in person on the banks of Drishadvati have blessed you with his good teachings. You have also heard the sermon of Maharishi Asit on Anjan mountain. 14-15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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