श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 85: दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.85.8 
न सन्ति लोकेषु पुमांस ईदृशा
इत्येव ये भावितबुद्धय: सदा।
ज्ञास्यन्ति तेऽऽत्मानमिमेऽद्य पाण्डवा
विपर्यये षण्ढतिला इवाफला:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
'जिन पाण्डवों के मन में सदैव यह अहंकार रहता था कि तीनों लोकों में हमारे समान कोई पुरुष नहीं है, वे आज विपरीत अवस्था को प्राप्त होकर खाली तिलों के समान निकम्मे हो गए हैं। अब उन्हें अपनी स्थिति ज्ञात होगी॥8॥
 
'The Pandavas who always had the arrogance in their minds that there are no men like us in the three worlds, have today reached the opposite state and have become worthless like empty sesame seeds. Now they will know their condition.॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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