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mahabharat 2.85.7: 'सभी पाण्डवों को चाहिए कि वे अपने पहने हुए विचित्र कवच और चमकते दिव्य वस्त्र उतारकर मृगचर्म धारण कर लें, जैसे उन्होंने सुबलपुत्र शकुनि के प्रस्ताव को स्वीकार करके जुआ खेला था।   |   mahabharat अध्याय 2.85: दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 85: दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.85.7 
चित्रान् सन्नाहानवमुच्य पार्था
वासांसि दिव्यानि च भानुमन्ति।
विवास्यन्तां रुरुचर्माणि सर्वे
यथा ग्लहं सौबलस्याभ्युपेता:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'सभी पाण्डवों को चाहिए कि वे अपने पहने हुए विचित्र कवच और चमकते दिव्य वस्त्र उतारकर मृगचर्म धारण कर लें, जैसे उन्होंने सुबलपुत्र शकुनि के प्रस्ताव को स्वीकार करके जुआ खेला था।
 
'All the Pandavas should remove the strange armour and shining divine clothes that they are wearing and wear deerskin, just as they have played gambling after accepting the offer of Shakuni, the son of Subala.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)