श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 85: दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  2.85.5-6 
नरकं पातिता: पार्था दीर्घकालमनन्तकम्।
सुखाच्च हीना राज्याच्च विनष्टा: शाश्वती: समा:॥ ५॥
धनेन मत्ता ये ते स्म धार्तराष्ट्रान् प्रहासिषु:।
ते निर्जिता हृतधना वनमेष्यन्ति पाण्डवा:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
'कुन्ती के पुत्र बहुत समय तक अनन्त दुःख रूपी नरक में डाले गए हैं। वे सुख और राज्य से सदा के लिए वंचित हो गए हैं। जो लोग पहले धन के मद में मदमस्त होकर धृतराष्ट्र के पुत्रों का उपहास करते थे, वे आज पराजित होकर धन और वैभव का त्याग करके वन में जा रहे हैं।॥5-6॥
 
‘Kunti's sons have been thrown into the hell of infinite suffering for a long time. They have been deprived of happiness and kingdom forever. Those who used to make fun of Dhritarashtra's sons earlier, being intoxicated with their wealth, are today defeated and going to the forest, giving up their wealth and splendor.॥ 5-6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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