श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 85: दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  2.85.41 
हन्तास्मि तरसा युद्धे त्वामेवेह सबान्धवम्।
यदि स्थास्यसि संग्रामे क्षत्रधर्मेण सौबल॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
हे सुबलपुत्र! यदि तुम क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध में डटे रहोगे तो मैं अवश्य ही तुम्हारे बन्धुओं सहित तुम्हें बड़े बल से मार डालूँगा।
 
O son of Subala, if you remain steadfast in the battle according to the dharma of a Kshatriya, then I will surely kill you with great force along with your relatives. 41.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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