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mahabharat 2.85.32: अर्जुन बोले - भैया भीमसेन! जो सदैव हम लोगों में दोष ही ढूंढ़ता है, हमारे दुःखों पर प्रसन्न होता है, कौरवों को बुरी सलाह देता है और अनावश्यक रूप से बढ़ा-चढ़ाकर कहता है, मैं आपकी आज्ञा से युद्ध में उस कर्ण को अवश्य मार डालूँगा।   |   mahabharat अध्याय 2.85: दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 85: दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.85.32 
अर्जुन उवाच
असूयितारं द्रष्टारं प्रवक्तारं विकत्थनम्।
भीमसेन नियोगात् ते हन्ताहं कर्णमाहवे॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन बोले - भैया भीमसेन! जो सदैव हम लोगों में दोष ही ढूंढ़ता है, हमारे दुःखों पर प्रसन्न होता है, कौरवों को बुरी सलाह देता है और अनावश्यक रूप से बढ़ा-चढ़ाकर कहता है, मैं आपकी आज्ञा से युद्ध में उस कर्ण को अवश्य मार डालूँगा।
 
Arjun said - Brother Bhimasena! The one who always finds faults in us, gets pleased at our sorrows, gives bad advice to the Kauravas and unnecessarily exaggerates, I will surely kill that Karna in the war with your permission.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)