श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 85: दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.85.17 
यथा तुदसि मर्माणि वाक्शरैरिह नो भृशम्।
तथा स्मारयिता तेऽहं कृन्तन् मर्माणि संयुगे॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जैसे तुम यहाँ अपने वचनों से हमारे प्राणों को अत्यन्त पीड़ा पहुँचा रहे हो, वैसे ही जब मैं युद्ध में तुम्हारे हृदय को छेदने लगूँगा, तब मैं तुम्हें तुम्हारे ये वचन स्मरण कराऊँगा॥ 17॥
 
Just as you are causing severe pain to our vital spots with your words here, similarly when I start piercing your heart in the war, then I will remind you of these words of yours.॥ 17॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas