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mahabharat 2.85.14: "इन नपुंसक और पतित पांडवों की तिल के समान सेवा करने से तुम्हें क्या लाभ होगा? तुम्हें तो केवल व्यर्थ श्रम ही सहना पड़ेगा।" इस प्रकार धृतराष्ट्र के क्रूर पुत्र दु:शासन ने पांडवों को अनेक कठोर वचन कहे।   |   mahabharat अध्याय 2.85: दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 85: दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.85.14 
किं पाण्डवांस्ते पतितानुपास्य
मोघ: श्रम: षण्ढतिलानुपास्य।
एवं नृशंस: परुषाणि पार्था-
नश्रावयद् धृतराष्ट्रस्य पुत्र:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
"इन नपुंसक और पतित पांडवों की तिल के समान सेवा करने से तुम्हें क्या लाभ होगा? तुम्हें तो केवल व्यर्थ श्रम ही सहना पड़ेगा।" इस प्रकार धृतराष्ट्र के क्रूर पुत्र दु:शासन ने पांडवों को अनेक कठोर वचन कहे।
 
"What will you gain by serving these impotent and fallen Pandavas like empty sesame seeds? You will only have to bear useless labour." In this manner, Dhritarashtra's ruthless son Dushasan spoke many harsh words to the Pandavas.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)