श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 85: दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.85.13 
यथाफला: षण्ढतिला यथा चर्ममया मृगा:।
तथैव पाण्डवा: सर्वे यथा काकयवा अपि॥ १३॥
 
 
अनुवाद
‘जैसे खाली तिल बोने पर फल नहीं देते, जैसे केवल खाल वाला मृग व्यर्थ है और जैसे बिना माजूफल के घास व्यर्थ है, उसी प्रकार समस्त पाण्डवों का जीवन व्यर्थ हो गया है॥13॥
 
‘Just as empty sesame seeds do not yield any fruit when sown, just as deer with only skin are useless and just as grass without starch is useless, in the same way the lives of all the Pandavas have become futile.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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