श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 85: दु:शासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.85.1 
वैशम्पायन उवाच
तत: पराजिता: पार्था वनवासाय दीक्षिता:।
अजिनान्युत्तरीयाणि जगृहुश्च यथाक्रमम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! तत्पश्चात् जुए में पराजित हुए कुन्ती के पुत्रों ने वनवास की दीक्षा ली और धीरे-धीरे उन सबने मृगचर्म को वस्त्र के रूप में धारण कर लिया॥1॥
 
Vaishmpayana says: O King! Thereafter, Kunti's sons who were defeated in gambling took the initiation of exile and gradually all of them wore deerskin as upper garments.॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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