श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 84: सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुन: जूआ खेलना और हारना  »  श्लोक d1h
 
 
श्लोक  2.84.d1h 
(वैशम्पायन उवाच)
एवं दैवबलाविष्टो धर्मराजो युधिष्ठिर:।
भीष्मद्रोणैर्वार्यमाणो विदुरेण च धीमता॥
युयुत्सुना कृपेणाथ सञ्जयेन च भारत।
गान्धार्या पृथया चैव भीमार्जुनयमैस्तथा॥
विकर्णेन च वीरेण द्रौपद्या द्रौणिना तथा।
सोमदत्तेन च तथा बाह्लीकेन च धीमता॥
वार्यमाणोऽपि सततं न च राजा नियच्छति।)
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! उस समय धर्मराज युधिष्ठिर नियति के वश में थे। महाराज! भीष्म, द्रोण और बुद्धिमान विदुरजी उसे दोबारा जुआ खेलने से रोक रहे थे। युयुत्सु, कृपाचार्य और संजय भी उन्हें रोक रहे थे। गांधारी, कुंती, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, वीर विकर्ण, द्रौपदी, अश्वत्थामा, सोमदत्त और बुद्धिमान बाह्लीक भी उन्हें बार-बार रोक रहे थे, लेकिन फिर भी नियति के प्रभाव के कारण राजा युधिष्ठिर ने जुआ खेलना नहीं छोड़ा।
 
Vaishampayana says- Janamejaya! At that time Dharmaraja Yudhishthira was under the influence of destiny. Maharaj! Bhishma, Drona and the wise Vidurji were stopping him from playing gambling again. Yuyutsu, Kripacharya and Sanjaya were also stopping him. Gandhari, Kunti, Bhima, Arjun, Nakul, Sahadev, Veer Vikarna, Draupadi, Ashwatthama, Somdatta and the wise Bahlik were also stopping him repeatedly, but still King Yudhishthira did not stop gambling due to the influence of destiny.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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