श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 84: सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुन: जूआ खेलना और हारना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.84.5 
वैशम्पायन उवाच
असम्भवे हेममयस्य जन्तो-
स्तथापि रामो लुलुभे मृगाय।
प्राय: समासन्नपराभवाणां
धियो विपर्यस्ततरा भवन्ति॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, 'जनमेजय! पशु का शरीर सोने का होना सम्भव नहीं है; फिर भी श्री राम सोने के प्रतीत होने वाले मृग को देखकर मोहित हो गए। जिनका पतन या पराजय निकट होता है, उनकी बुद्धि प्रायः बहुत विपरीत हो जाती है।॥5॥
 
Vaishampayana says, 'Janamejaya! It is not possible for an animal's body to be made of gold; yet Shri Ram was tempted by the deer which appeared to be made of gold. Those whose downfall or defeat is near, their intellect often becomes very contrary. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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