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mahabharat 2.84.24: भरत! वनवास की शर्त रखकर केवल एक बार पासे फेंकने से ही जुए का खेल पूरा हो जाएगा। युधिष्ठिर ने उनकी बात मान ली। तब सुबलपुत्र शकुनि ने पासे हाथ में लिए और उन्हें फेंककर युधिष्ठिर से कहा - मैं जीत गया हूँ॥ 24॥   |   mahabharat अध्याय 2.84: सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुन: जूआ खेलना और हारना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 84: सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुन: जूआ खेलना और हारना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.84.24 
समुत्क्षेपेण चैकेन वनवासाय भारत।
प्रतिजग्राह तं पार्थो ग्लहं जग्राह सौबल:।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत॥ २४॥
 
 
अनुवाद
भरत! वनवास की शर्त रखकर केवल एक बार पासे फेंकने से ही जुए का खेल पूरा हो जाएगा। युधिष्ठिर ने उनकी बात मान ली। तब सुबलपुत्र शकुनि ने पासे हाथ में लिए और उन्हें फेंककर युधिष्ठिर से कहा - मैं जीत गया हूँ॥ 24॥
 
Bharata! By keeping the condition of exile, the game of gambling will be completed by throwing the dice only once. Yudhishthira accepted his offer. Then Subala's son Shakuni took the dice in his hand and after throwing it said to Yudhishthira - I have won.॥ 24॥
 
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि पुनर्युधिष्ठिरपराभवे षट्सप्ततितमोऽध्याय:॥ ७६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें युधिष्ठिरपराभवविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७६॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २७ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)