श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 84: सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुन: जूआ खेलना और हारना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  2.84.22 
एष नो ग्लह एवैको वनवासाय पाण्डवा:।
यूयं वयं वा विजिता वसेम वनमाश्रिता:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
फिर भी (इनके अतिरिक्त) हमारा एकमात्र विकल्प वनवास ही है। पाण्डवों! जो भी हारेगा, चाहे तुम हारो या हम, उसे वन में जाकर रहना ही होगा॥ 22॥
 
Nevertheless (apart from these) our only choice is certainly exile. Pandavas! Whoever loses, you or we, will have to go and live in the forest.॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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