श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 84: सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुन: जूआ खेलना और हारना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.84.18 
वैशम्पायन उवाच
जनप्रवादान् सुबहूञ्छृण्वन्नपि नराधिप:।
ह्रिया च धर्मसंयोगात् पार्थो द्यूतमियात् पुन:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! लोगों से नाना प्रकार की बातें सुनकर भी राजा युधिष्ठिर लज्जा के कारण तथा धृतराष्ट्र की आज्ञा का पालन करने के कारण धर्म के प्रति आदर के कारण पुनः जुआ खेलने के लिए तैयार हो गये।
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! Despite hearing various kinds of things from people, King Yudhishthira, out of shame and out of respect for Dharma (righteousness) in the form of obeying Dhritarashtra's orders, got ready to play gambling once again.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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