श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 84: सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुन: जूआ खेलना और हारना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.84.1 
वैशम्पायन उवाच
ततो व्यध्वगतं पार्थं प्रातिकामी युधिष्ठिरम्।
उवाच वचनाद् राज्ञो धृतराष्ट्रस्य धीमत:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! धर्मराज युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ के मार्ग से बहुत दूर निकल गए थे। उस समय बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र की आज्ञा से प्रतिकामि उनके पास गई और इस प्रकार बोली -॥1॥
 
Vaishmpayana says - O King! Dharmaraja Yudhishthira had gone a long way on the way to Indraprastha. At that time, on the orders of the wise king Dhritarashtra, Pratikaami went to him and spoke thus -॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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