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श्लोक 2.83.5-6  |
मा कुलस्य क्षये घोरे कारणं त्वं भविष्यसि।
बद्धं सेतुं को नु भिन्द्याद् धमेच्छान्तं च पावकम्॥ ५॥
शमे स्थितान् को नु पार्थान् कोपयेद् भरतर्षभ।
स्मरन्तं त्वामाजमीढ स्मारयिष्याम्यहं पुन:॥ ६॥ |
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| अनुवाद |
| हे भरतश्रेष्ठ! इस कुल के भयंकर विनाश का कारण तुम स्वयं मत बनो। हे भरतश्रेष्ठ! जो सेतु बना है, उसे कौन तोड़ेगा? जो शत्रुता की अग्नि बुझ गई है, उसे कौन प्रज्वलित करेगा? कुन्ती के शांतिप्रिय पुत्रों को पुनः क्रोध दिलाने का साहस कौन करेगा? हे अजमीढ़ कुल के रत्न! तुम सब कुछ जानते और स्मरण करते हो, फिर भी मैं तुम्हें बार-बार स्मरण कराता रहूँगा॥ 5-6॥ |
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| ‘Do not yourself become the cause of the terrible destruction of this clan. O best of the Bharatas! Who will break the bridge that has been built? Who will ignite the fire of enmity that has been extinguished? Who will dare to anger the peace-loving sons of Kunti again? O jewel of the Ajamidh clan! You know and remember everything, yet I will keep reminding you again and again.॥ 5-6॥ |
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