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mahabharat 2.83.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! उस समय पुण्यात्मा गान्धारी भावी अनिष्ट की आशंका से आशंकित होकर पुत्र-प्रेम के कारण शोक से विह्वल हो उठीं और राजा धृतराष्ट्र से इस प्रकार बोलीं -॥1॥   |   mahabharat अध्याय 2.83: गान्धारीकी धृतराष्ट्रको चेतावनी और धृतराष्ट्रका अस्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 83: गान्धारीकी धृतराष्ट्रको चेतावनी और धृतराष्ट्रका अस्वीकार करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.83.1 
वैशम्पायन उवाच
अथाब्रवीन्महाराज धृतराष्ट्रं जनेश्वरम्।
पुत्रहार्दाद् धर्मयुक्ता गान्धारी शोककर्षिता॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! उस समय पुण्यात्मा गान्धारी भावी अनिष्ट की आशंका से आशंकित होकर पुत्र-प्रेम के कारण शोक से विह्वल हो उठीं और राजा धृतराष्ट्र से इस प्रकार बोलीं -॥1॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! At that time, the virtuous Gandhari, apprehensive of the future evil, became overcome with grief out of love for her son and spoke to King Dhritarashtra thus:॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)