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mahabharat 2.82.d10-d11: महाराज! अर्जुन के पराक्रम का और अधिक वर्णन सुनिए; उन्होंने अग्निदेव के अनुरोध पर खाण्डव वन उन्हें समर्पित कर दिया था। महाराज! उनसे प्राप्त होते ही भगवान अग्निदेव ने उस वन को अपना आहार बनाना आरम्भ कर दिया।   |   mahabharat अध्याय 2.82: दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे अर्जुनकी वीरता बतलाकर पुन: द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवोंको बुलानेका अनुरोध और उनकी स्वीकृति   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 82: दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे अर्जुनकी वीरता बतलाकर पुन: द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवोंको बुलानेका अनुरोध और उनकी स्वीकृति  »  श्लोक d10-d11
 
 
श्लोक  2.82.d10-d11 
भूय: शृणु महाराज फाल्गुनस्य तु साहसम्।
ददौ च वह्नेर्बीभत्सु: प्रार्थितं खाण्डवं वनम्॥
लब्धमात्रे तु तेनाथ भगवान् हव्यवाहन:।
भक्षितुं खाण्डवं राजंस्तत: समुपचक्रमे॥
 
 
अनुवाद
महाराज! अर्जुन के पराक्रम का और अधिक वर्णन सुनिए; उन्होंने अग्निदेव के अनुरोध पर खाण्डव वन उन्हें समर्पित कर दिया था। महाराज! उनसे प्राप्त होते ही भगवान अग्निदेव ने उस वन को अपना आहार बनाना आरम्भ कर दिया।
 
Maharaj! Listen to more description of Arjun's courage; he had dedicated Khandava forest to Agnidev on his request. King! As soon as he got it from him, Lord Agnidev started making that forest his food.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)