श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 82: दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे अर्जुनकी वीरता बतलाकर पुन: द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवोंको बुलानेका अनुरोध और उनकी स्वीकृति  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  2.82.25-26 
वैशम्पायन उवाच
ततो द्रोण: सोमदत्तो बाह्लीकश्चैव गौतम:।
विदुरो द्रोणपुत्रश्च वैश्यापुत्रश्च वीर्यवान्॥ २५॥
भूरिश्रवा: शान्तनवो विकर्णश्च महारथ:।
मा द्यूतमित्यभाषन्त शमोऽस्त्विति च सर्वश:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तब द्रोणाचार्य, सोमदत्त, बाह्लीक, कृपाचार्य, विदुर, अश्वत्थामा, महाबली युयुत्सु, भूरिश्रवा, पितामह भीष्म और महारथी विकर्ण सभी ने एक स्वर से इस निर्णय का विरोध किया और कहा- 'अब जुआ नहीं खेलना चाहिए, तभी सर्वत्र शांति हो सकेगी।' 25-26॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Then Dronacharya, Somdutt, Bahlika, Kripacharya, Vidur, Ashwatthama, the mighty Yuyutsu, Bhurishrava, grandfather Bhishma and Maharathi Vikarna all opposed this decision with one voice and said - 'Now there should be no gambling, only then there can be peace everywhere'. 25-26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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