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mahabharat 2.82.10: क्रोध में भरे हुए और डसने को तत्पर विषैले सर्पों को कौन अपने गले या पीठ पर लटकाकर उसी अवस्था में छोड़ सकता है? ॥10॥   |   mahabharat अध्याय 2.82: दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे अर्जुनकी वीरता बतलाकर पुन: द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवोंको बुलानेका अनुरोध और उनकी स्वीकृति   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 82: दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे अर्जुनकी वीरता बतलाकर पुन: द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवोंको बुलानेका अनुरोध और उनकी स्वीकृति  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.82.10 
अहीनाशीविषान् क्रुद्धान् नाशाय समुपस्थितान्।
कृत्वा कण्ठे च पृष्ठे च क: समुत्स्रष्टुमर्हति॥ १०॥
 
 
अनुवाद
क्रोध में भरे हुए और डसने को तत्पर विषैले सर्पों को कौन अपने गले या पीठ पर लटकाकर उसी अवस्था में छोड़ सकता है? ॥10॥
 
Who can hang poisonous serpents, filled with anger and ready to bite, around his neck or on his back and then leave them in that state? ॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)