श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 82: दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे अर्जुनकी वीरता बतलाकर पुन: द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवोंको बुलानेका अनुरोध और उनकी स्वीकृति  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.82.1 
जनमेजय उवाच
अनुज्ञातांस्तान् विदित्वा सरत्नधनसंचयान्।
पाण्डवान् धार्तराष्ट्राणां कथमासीन्मनस्तदा॥ १॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने पूछा - हे ब्रह्मन्! जब कौरवों को यह ज्ञात हुआ कि पाण्डवों को रथ और धन सहित खाण्डवप्रस्थ जाने की अनुमति मिल गई है, तब उनके मन की क्या स्थिति हुई?॥1॥
 
Janamejaya asked - O Brahman! When the Kauravas came to know that the Pandavas had been given permission to go to Khandavaprastha with their chariots and wealth, what was the state of their mind?॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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