श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 81: धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको सारा धन लौटाकर एवं समझा-बुझाकर इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश देना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  2.81.15-16 
त्वयि धर्मोऽर्जुने धैर्यं भीमसेने पराक्रम:॥ १५॥
श्रद्धा च गुरुशुश्रूषा यमयो: पुरुषाग्रॺयो:।
अजातशत्रो भद्रं ते खाण्डवप्रस्थमाविश।
भ्रातृभिस्तेऽस्तु सौभ्रात्रं धर्मे ते धीयतां मन:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
तुममें धर्म है, अर्जुन में धैर्य है, भीमसेन में वीरता है और पुरुषोत्तम नकुल-सहदेव में गुरु के प्रति श्रद्धा और शुद्ध सेवा है। अजातशत्रु! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम खांडवप्रस्थ जाओ। दुर्योधन आदि भाइयों के प्रति तुम्हें एक अच्छे भाई के समान स्नेह रखना चाहिए और तुम्हारा मन सदैव धर्म में लगा रहना चाहिए। 15-16॥
 
You have religion, Arjun has patience, Bhimsen has bravery and the best of men Nakul-Sahdev have faith and pure service to Guru. Ajatashatro! do you good. Now you go to Khandavaprastha. You should have affection like a good brother towards your brothers like Duryodhana and your mind should always be engaged in religion. 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)