स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि।
सन्त: प्रतिविजानन्तो लब्ध्वा प्रत्ययमात्मन:॥ १०॥
अनुवाद
महापुरुष अपने अनुभवों को ध्यान में रखते हुए दूसरों के सुख-दुःख को अपना ही मानता है और उनके अच्छे आचरण को ही स्मरण रखता है, उनके द्वारा की गई शत्रुता या घृणा को नहीं।॥10॥
Keeping his own experiences in mind, a great man considers the joys and sorrows of others as his own and remembers only their good behaviour and not the hostility or hatred shown by them.॥10॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥