श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 80: शत्रुओंको मारनेके लिये उद्यत हुए भीमको युधिष्ठिरका शान्त करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.80.7 
तन्नो ज्योतिरभिहतं दाराणामभिमर्शनात्।
धनंजय कथंस्वित् स्यादपत्यमभिमृष्टजम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
धनंजय! दु:शासन ने हमारी पत्नी द्रौपदी के शरीर को बलपूर्वक स्पर्श करके उसे अपवित्र कर दिया है। इससे हमारी संतान का तेज नष्ट हो गया है। जिस स्त्री को दूसरे पुरुष ने स्पर्श किया हो, उससे संतान उत्पन्न करने का क्या लाभ होगा?॥ 7॥
 
Dhananjay! Dushasan has defiled our wife Draupadi by forcefully touching her body. This has destroyed the light of our progeny. What use will a child be born from a woman who has been touched by another man?॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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