श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 78: दुर्योधनके छल-कपटयुक्त वचन और भीमसेनका रोषपूर्ण उद्‍गार  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.78.5 
धर्मे स्थितो धर्मसुतो महात्मा
स्वयं चेदं कथयत्विन्द्रकल्प:।
ईशो वा ते ह्यनीशोऽथ वैष
वाक्यादस्य क्षिप्रमेकं भजस्व॥ ५॥
 
 
अनुवाद
ये धर्मपुत्र महापुरुष युधिष्ठिर इन्द्र के समान तेजस्वी हैं और सदैव धर्म में स्थित रहते हैं। उन्हें तुम्हें दाँव पर लगाने का अधिकार था या नहीं? वे स्वयं ही तुम्हें बताएँ; फिर उनके वचनों के अनुसार तुम्हें शीघ्र ही दासत्व या दास्य में से किसी एक का आश्रय ले लेना चाहिए ॥5॥
 
This son of Dharma, the great soul Yudhishthira, is as radiant as Indra and is always established in Dharma. Did he have the right to put you at stake or not? Let him tell you himself; then according to his words you should quickly take refuge in either slavery or slavery. ॥5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)