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श्लोक 2.77.20-21  |
एते द्रोणादयश्चैव वृद्धा धर्मविदो जना:।
शून्यै: शरीरैस्तिष्ठन्ति गतासव इवानता:॥ २०॥
युधिष्ठिरस्तु प्रश्नेऽस्मिन् प्रमाणमिति मे मति:।
अजितां वा जितां वेति स्वयं व्याहर्तुमर्हति॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| द्रोणाचार्य जैसे ये वृद्ध और ज्ञानी पुरुष भी सिर झुकाए और शरीर शून्य होकर बैठे हैं, मानो प्राण हार गए हों। मेरा मत है कि इस प्रश्न का निर्णय करने के लिए धर्मराज युधिष्ठिर ही सबसे अधिक अधिकारी हैं। आप जीते हैं या नहीं? यह तो उन्हें ही बताना चाहिए। |
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| These old and knowledgeable men like Dronacharya are also sitting with their heads hanging down and their bodies empty, as if they have lost their lives. It is my opinion that Dharmaraja Yudhishthira is the most authoritative person to decide this question. Have you won or not? He should tell this himself. |
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इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि भीष्मवाक्ये एकोनसप्ततितमोऽध्याय:॥ ६९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें भीष्मवाक्यविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६९॥
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