श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 77: द्रौपदीका चेतावनीयुक्त विलाप एवं भीष्मका वचन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.77.14 
भीष्म उवाच
उक्तवानस्मि कल्याणि धर्मस्य परमा गति:।
लोके न शक्यते ज्ञातुमपि विज्ञैर्महात्मभि:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले- कल्याणी! मैं पहले ही कह चुका हूँ कि धर्म की गति अत्यन्त सूक्ष्म है। इस संसार में ज्ञानी मुनि भी उसे ठीक-ठीक नहीं समझ सकते॥ 14॥
 
Bhishmaji said- Kalyani! I have already said that the movement of Dharma is very subtle. Even the knowledgeable sages in this world cannot understand it accurately.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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