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श्लोक 2.77.13  |
जितां वाप्यजितां वापि मन्यध्वं मां यथा नृपा:।
तथा प्रत्युक्तमिच्छामि तत् करिष्यामि कौरवा:॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| कुरुवंशियो! तुम क्या सोचते हो? मैं जीता हूँ या नहीं? मैं तुमसे सही उत्तर सुनना चाहता हूँ। फिर उसके अनुसार कार्य करूँगा॥ 13॥ |
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| Kuruvanshis! What do you think? Have I won or not? I want to hear the correct answer from you. Then I will act accordingly.॥ 13॥ |
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