श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 84-85h
 
 
श्लोक  2.76.84-85h 
तानि सर्वाणि दु:खानि प्राप्नोति वितथं ब्रुवन्।
समक्षदर्शनात् साक्षी श्रवणाच्चेति धारणात्॥ ८४॥
तस्मात् सत्यं ब्रुवन् साक्षी धर्मार्थाभ्यां न हीयते।
 
 
अनुवाद
झूठ बोलने वाला मनुष्य उन सब दुःखों का भागी होता है। साक्षी अपने सामने देखने, सुनने और धारण करने से जाना जाता है, अतः सत्य बोलने वाला साक्षी कभी धर्म और अर्थ से वंचित नहीं होता।
 
A man who tells lies is a part of all those sorrows. A witness is known by seeing, hearing and imbibing in front of him, hence a witness who speaks the truth is never deprived of Dharma and Artha. 84 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)