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mahabharat 2.76.52-53: जमींदारों! यह कुविचारित कुशासन भरतवंश के लिए कलंक है। मैं युद्ध में बलपूर्वक इस पापी की छाती फाड़कर उसका रक्त पी जाऊँगा। यदि मैं नहीं पीऊँगा, अर्थात् जो कहा था, उसे पूरा नहीं करूँगा, तो मुझे अपने पूर्वजों का उत्तम मार्ग नहीं मिलेगा। 52-53॥   |   mahabharat अध्याय 2.76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 52-53
 
 
श्लोक  2.76.52-53 
यद्येतदेवमुक्त्वाहं न कुर्यां पृथिवीश्वरा:।
पितामहानां पूर्वेषां नाहं गतिमवाप्नुयाम्॥ ५२॥
अस्य पापस्य दुर्बुद्धेर्भारतापसदस्य च।
न पिबेयं बलाद् वक्षो भित्त्वा चेद् रुधिरं युधि॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
जमींदारों! यह कुविचारित कुशासन भरतवंश के लिए कलंक है। मैं युद्ध में बलपूर्वक इस पापी की छाती फाड़कर उसका रक्त पी जाऊँगा। यदि मैं नहीं पीऊँगा, अर्थात् जो कहा था, उसे पूरा नहीं करूँगा, तो मुझे अपने पूर्वजों का उत्तम मार्ग नहीं मिलेगा। 52-53॥
 
Landlords! This ill-conceived misrule is a disgrace to the Bharat dynasty. I will forcefully tear open this sinner's chest in battle and drink his blood. If I don't drink, that is, if I don't fulfill what I said, then I won't get the best path of my forefathers. 52-53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)