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mahabharat 2.76.21: इन विकारों में आसक्त मनुष्य मनमाना आचरण करने लगता है और धर्म की अवहेलना करता है। ऐसे विकारों में आसक्त मनुष्य के किसी भी कार्य का लोग आदर नहीं करते।॥21॥   |   mahabharat अध्याय 2.76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.76.21 
एतेषु हि नर: सक्तो धर्ममुत्सृज्य वर्तते।
यथायुक्तेन च कृतां क्रियां लोको न मन्यते॥ २१॥
 
 
अनुवाद
इन विकारों में आसक्त मनुष्य मनमाना आचरण करने लगता है और धर्म की अवहेलना करता है। ऐसे विकारों में आसक्त मनुष्य के किसी भी कार्य का लोग आदर नहीं करते।॥21॥
 
‘A person addicted to these vices starts behaving arbitrarily and disregards Dharma. People do not respect any work done by such a person addicted to vices.॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)