श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 75: प्रातिकामीके बुलानेसे न आनेपर दु:शासनका सभामें द्रौपदीको केश पकड़कर घसीटकर लाना एवं सभासदोंसे द्रौपदीका प्रश्न  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.75.51 
अशुद्धभावैर्निकृतिप्रवृत्तै-
रबुध्यमान: कुरुपाण्डवाग्रॺ:।
सम्भूय सर्वैश्च जितोऽपि यस्मात्
पश्चादयं कैतवमभ्युपेत:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
जिनके हृदय शुद्ध नहीं हैं और जो सदैव छल-कपट में लगे रहते हैं, उन दुष्टात्माओं ने मिलकर निर्दोष एवं वीर कुरु-पाण्डव राजा युधिष्ठिर को जुए में हरा दिया है और अब उन्होंने उसे मुझे भी दांव पर लगाने के लिए विवश कर दिया है ॥ 51॥
 
Those evil souls whose hearts are not pure and who are always engaged in deceit and fraud have together defeated the innocent and brave Kuru-Pandava king Yudhishthir in gambling and now they have forced him to put me at stake. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)