श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 75: प्रातिकामीके बुलानेसे न आनेपर दु:शासनका सभामें द्रौपदीको केश पकड़कर घसीटकर लाना एवं सभासदोंसे द्रौपदीका प्रश्न  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  2.75.48 
त्यजेत सर्वां पृथिवीं समृद्धां
युधिष्ठिरो धर्ममथो न जह्यात्।
उक्तं जितोऽस्मीति च पाण्डवेन
तस्मान्न शक्नोमि विवेक्तुमेतत्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
मैं मानता हूँ कि धर्मराज युधिष्ठिर धन-धान्य से परिपूर्ण इस सम्पूर्ण पृथ्वी को त्याग सकते हैं, परन्तु धर्म को नहीं त्याग सकते। इस पाण्डवपुत्र ने स्वयं कहा है कि मैं हार गया हूँ; अतः मैं इस प्रश्न पर विचार नहीं कर सकता ॥48॥
 
I believe that Dharmaraja Yudhishthira can give up this entire earth full of wealth and prosperity, but he cannot give up Dharma. This son of Pandava himself has said that I have lost myself; hence I cannot discuss this question. ॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)