vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 2: सभा पर्व
»
अध्याय 75: प्रातिकामीके बुलानेसे न आनेपर दु:शासनका सभामें द्रौपदीको केश पकड़कर घसीटकर लाना एवं सभासदोंसे द्रौपदीका प्रश्न
»
श्लोक 22
श्लोक
2.75.22
पाण्डवाश्च महात्मानो दीना दु:खसमन्विता:।
सत्येनातिपरीताङ्गा नोदीक्षन्ते स्म किंचन॥ २२॥
अनुवाद
इधर महात्मा पाण्डव सत्य के बन्धन में बँधकर अत्यन्त दरिद्र और दुःखी हो गये, उन्हें कुछ भी सुध नहीं रही ॥22॥
Here, Mahatma Pandava became extremely poor and saddened by being bound by the bondage of truth. He could not think of anything. 22॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×