श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 75: प्रातिकामीके बुलानेसे न आनेपर दु:शासनका सभामें द्रौपदीको केश पकड़कर घसीटकर लाना एवं सभासदोंसे द्रौपदीका प्रश्न  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.75.1 
वैशम्पायन उवाच
धिगस्तु क्षत्तारमिति ब्रुवाणो
दर्पेण मत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्र:।
अवैक्षत प्रातिकामीं सभाया-
मुवाच चैनं परमार्यमध्ये॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन अभिमान से उन्मत्त हो रहा था। उसने प्रतिकामि की ओर देखकर कहा, 'विदुर को धिक्कार है' और सभा में बैठे हुए महापुरुषों के सामने उससे यह बात कही। 1.
 
Vaishampayana says - Janamejaya! Dhritarashtra's son Duryodhan was becoming mad with pride. He looked at Pratikami and said, 'Shame on Vidur' and said this to him in the presence of the great men sitting in the assembly. 1.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)