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mahabharat 2.72.5: कटु वचन बोलने वाला मनुष्य शत्रु बन जाता है। शत्रु की प्रशंसा करते हुए भी लोग अपने गहरे भावों को छिपाए रखते हैं। निर्लज्ज विदुर! तुम भी यही नीति अपनाकर चुप क्यों नहीं रहते? हमारे काम में विघ्न क्यों डालते हो? जो मन में आता है, बकते रहते हो॥ 5॥   |   mahabharat अध्याय 2.72: दुर्योधनका विदुरको फटकारना और विदुरका उसे चेतावनी देना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 72: दुर्योधनका विदुरको फटकारना और विदुरका उसे चेतावनी देना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.72.5 
अमित्रतां याति नरोऽक्षमं ब्रुवन्
निगूहते गुह्यममित्रसंस्तवे।
तदाश्रितोऽपत्रप किं नु बाधसे
यदिच्छसि त्वं तदिहाभिभाषसे॥ ५॥
 
 
अनुवाद
कटु वचन बोलने वाला मनुष्य शत्रु बन जाता है। शत्रु की प्रशंसा करते हुए भी लोग अपने गहरे भावों को छिपाए रखते हैं। निर्लज्ज विदुर! तुम भी यही नीति अपनाकर चुप क्यों नहीं रहते? हमारे काम में विघ्न क्यों डालते हो? जो मन में आता है, बकते रहते हो॥ 5॥
 
A person who speaks harsh words becomes an enemy. Even while praising the enemy, people keep their deep feelings hidden. Shameless Vidur! Why don't you also follow the same policy and keep quiet? Why do you create obstacles in our work? You keep blabbering whatever comes to your mind.॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)