श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 71: विदुरजीके द्वारा जूएका घोर विरोध  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.71.5 
दुर्योधनो ग्लहते पाण्डवेन
प्रियायसे त्वं जयतीति तच्च।
अतिनर्मा जायते सम्प्रहारो
यतो विनाश: समुपैति पुंसाम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
तुम यह सोचकर बहुत प्रसन्न हो रहे हो कि दुर्योधन पाण्डवपुत्र युधिष्ठिर के साथ जुआ खेल रहा है और जीत भी रहा है। परन्तु आज का यह अत्यधिक आनन्द शीघ्र ही एक भयंकर युद्ध में बदल जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप असंख्य लोग नष्ट हो जाएँगे।॥5॥
 
You are very happy thinking that Duryodhana is gambling with Yudhishthira, the son of Pandava, and he is winning as well. But today's excessive fun will soon turn into a terrible war which will result in the destruction of countless people. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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