श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 71: विदुरजीके द्वारा जूएका घोर विरोध  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.71.4 
यश्चित्तमन्वेति परस्य राजन्
वीर: कवि: स्वामवमन्य दृष्टिम्।
नावं समुद्रे इव बालनेत्रा-
मारुह्य घोरे व्यसने निमज्जेत्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! जो वीर और विद्वान् पुरुष अपने विचारों की उपेक्षा करके दूसरों की इच्छा के अनुसार कार्य करता है, वह समुद्र में मूर्ख नाविक द्वारा चलाई जा रही नाव में बैठे हुए मनुष्य के समान भयंकर विपत्ति में पड़ता है।॥4॥
 
O King! A brave and learned man who ignores his own views and acts according to the wishes of others, falls into a terrible calamity like a man sitting in a boat driven by a foolish sailor in the sea. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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