श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 71: विदुरजीके द्वारा जूएका घोर विरोध  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.71.10 
जानीमहे देवितं सौबलस्य
वेद द्यूते निकृतिं पर्वतीय:।
यत: प्राप्त: शकुनिस्तत्र यातु
मा यूयुधो भारत पाण्डवेयान्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मैं, सुबलपुत्र शकुनि, जुआ खेलना जानता हूँ। यह पर्वतराज जुए के सभी छल-कपट जानता है। मेरी इच्छा है कि शकुनि वहीं लौट जाए जहाँ से आया था। भारत! इस प्रकार कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध की आग न भड़काओ॥10॥
 
I, Shakuni, son of Subala, know how to gamble. This mountain king knows all the deceits of gambling. I wish that Shakuni should return to where he came from. Bhaarat! Do not kindle the fire of war between the Kauravas and the Pandavas in this manner.॥10॥
 
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि विदुरवाक्ये त्रिषष्टितमोऽध्याय:॥ ६३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें विदुरवाक्यविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६३॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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