| श्री महाभारत » पर्व 2: सभा पर्व » अध्याय 70: धृतराष्ट्रको विदुरकी चेतावनी » श्लोक 1 |
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| | | | श्लोक 2.70.1  | वैशम्पायन उवाच
एवं प्रवर्तिते द्यूते घोरे सर्वापहारिणि।
सर्वसंशयनिर्मोक्ता विदुरो वाक्यमब्रवीत्॥ १॥ | | | | | | अनुवाद | | वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! जब सब कुछ हर लेने वाला वह भयंकर पासा-खेल चल रहा था, उसी समय समस्त संशय दूर करने वाले विदुरजी बोले॥1॥ | | | | Vaishmpayana says: Janamejaya! When the dreadful game of dice, which was taking away everything, was going on, at that very time Vidur, the dispeller of all doubts, spoke up. ॥1॥ | | ✨ ai-generated | | |
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