श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 7: इन्द्रसभाका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.7.1 
नारद उवाच
शक्रस्य तु सभा दिव्या भास्वरा कर्मनिर्मिता।
स्वयं शक्रेण कौरव्य निर्जितार्कसमप्रभा॥ १॥
 
 
अनुवाद
नारदजी कहते हैं- कुरुनन्दन! इन्द्र की यह तेजस्वी दिव्य सभा सूर्य के समान चमकती है। यह (विश्वकर्मा) के प्रयत्नों से उत्पन्न हुई है। स्वयं इन्द्र ने (सौ यज्ञ करके) इसे जीत लिया है। 1॥
 
Naradji says- Kurunandan! Indra's glorious divine assembly shines like the sun. It has been created due to the efforts of (Vishwakarma). Indra himself has conquered him (by performing hundred yagyas). 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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