श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 69: जूएमें शकुनिके छलसे प्रत्येक दाँवपर युधिष्ठिरकी हार  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.69.7 
वैशम्पायन उवाच
एवं श्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रित:।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! यह सुनकर हाथी का आश्रय लिए हुए शकुनि ने पुनः पासे फेंके और विजेता का निश्चय करके युधिष्ठिर से कहा - 'देखो, यह भी मैं जीत गया।'
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing this, Shakuni, who had taken shelter of the elephant, threw the dice again and after being sure of the winner, said to Yudhishthira - 'See, I have won this too.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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