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श्लोक 2.69.31  |
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रित:।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायन कहते हैं, 'हे जनमेजय!' यह सुनकर राक्षसराज की शरण में आये शकुनि ने पहले की तरह पूर्ण विश्वास के साथ युधिष्ठिर से कहा, 'यह चाल भी मैंने जीत ली है।' |
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| Vaishmpayana says, 'O Janamejaya! On hearing this, Shakuni, who had taken refuge in the demon king, said to Yudhishthira with full confidence as before, 'I have won this move too.' |
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इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि देवने एकषष्टितमोऽध्याय:॥ ६१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें द्यूतक्रीड़ाविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६१॥
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