श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 69: जूएमें शकुनिके छलसे प्रत्येक दाँवपर युधिष्ठिरकी हार  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.69.28 
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रित:।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! यह सुनकर छल के उपासक शकुनि ने पुनः पूर्ण विश्वास के साथ युधिष्ठिर से कहा - 'यह चाल भी मैंने जीत ली है।'॥ 28॥
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing this, Shakuni, the worshipper of deceit, once again said to Yudhishthira with full confidence - 'I have won this move as well.'॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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