श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 67: जूएके अनौचित्यके सम्बन्धमें युधिष्ठिर और शकुनिका संवाद  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.67.8 
अक्षग्लह: सोऽभिभवेत् परं न-
स्तेनैव दोषो भवतीह पार्थ।
दीव्यामहे पार्थिव मा विशङ्कां
कुरुष्व पाणं च चिरं च मा कृथा:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
कुन्ती नंदन! यदि पासे हमारे विरुद्ध पड़ें, तो कोई एक पक्ष दूसरे पक्ष को हरा सकता है; अतः विजय और पराजय दिव्य पासों पर निर्भर करती है। इसी कारण पराजय का दोष प्राप्त होता है। हमें भी हारने का संदेह है, फिर भी हम खेलते हैं। अतः भूमिपाल! संदेह मत करो, अपना दांव लगाओ, अब विलम्ब मत करो।
 
Kunti Nandan! If the dice falls against us, then one of the players can defeat the other side; hence victory and defeat depend on the divine dice. It is because of this that the fault of defeat is attained. We too have the doubt of losing, still we play. Hence Bhumipal! Do not doubt, place your bet, do not delay now.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)