श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 65: विदुर और धृतराष्ट्रकी बातचीत  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.65.4 
धृतराष्ट्र उवाच
नेह क्षत्त: कलहस्तप्स्यते मां
न चेद् दैवं प्रतिलोमं भविष्यत्।
धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलेदं
सर्वं जगच्चेष्टति न स्वतन्त्रम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले - विदुर ! यदि भाग्य मेरे विरुद्ध न हो, तो कलह भी मुझे कष्ट नहीं दे सकेगा। विधाता द्वारा रचित यह सम्पूर्ण जगत भाग्य के अधीन ही चल रहा है, स्वतन्त्र नहीं है ॥4॥
 
Dhritarashtra said - Vidur! If the fate is not against me, then even quarrels will not be able to trouble me. This entire world created by the Creator is functioning under the control of the fate, it is not independent. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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